चंडीगढ़(CHANDIGARH): District Consumer Dispute Redressal Forum UT Chandigarh ने इमर्जिंग इंडिया रियल एसेट्स (Emerging India Real Assets) को निर्देश दिया कि बिना किसी अथॉरिटी यानी Greater Mohali Area Development Authority (GMADA) के अनुमति और लाइसेंस के बिना भूखंड बेचने के लिए 35,000 रुपये मुआवजा अदा करें | बिल्डर को यह भी निर्देश दिया गया कि वह 5.03 लाख रुपये 9% प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ पैसे जमा करने की तरीख से अभी तक वापस करे |
शिकायतकर्ता (complainant), सेक्टर 25 पंचकूला के निवासी अजीब कौर ने अपनी शिकायत में कहा कि Landran Highway, Punjab, Banur में उनके प्रस्तावित प्रोजेक्ट के बारे में बिल्डरों के बयानों और अभ्यावेदन पर विश्वास किया जिसमे यह भी कहा गया था कि यह प्रोजेक्ट GMADA (Greater Mohali Area Development Authority) से मंजूर हो गया है | जिसके बाद उन्होंने इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत एक आवासीय प्लाट को बुक किया था |
बाद में शिकायतकर्ता (complainant) को पता चला कि बिल्डर द्वारा बेचे जा रहे आवासीय प्लॉट्स संबंधित अथॉरिटी यानी GMADA से डिवेलपमेंट लाइसेंस के बिना बेचे जा रहे थे | शिकायतकर्ता के अनुसार वह उनके ऑफिस गया और अपने पैसे की मांग करने लगा लेकिन उस विषय में उन लोगो ने कुछ नहीं किया |
इसके जबाव में बिल्डर ने कहा कि जो प्लॉट शिकायतकर्ता (complainant) द्वारा बुक किया गया है, उसी का भुगतान किस्त लिंक्ड पेमेंट प्लान के तहत शिकायतकर्ता (complainant) द्वारा किया जाना था | शिकायतकर्ता ने 27 लाख रुपये की शुद्ध बिक्री मूल्य के मुकाबले केवल 4.80 लाख रुपये का भुगतान किया है | यह शिकायतकर्ता (complainant) की ही गलती है कि वह पूर्ण रूप से जानने के बाद सभी पेमेंट कथित रूप से करते रहे और यह क़िस्त से जुडी योजना के अंतर्गत था और समय अनुबंध का सार था |
यह जोड़ा गया कि भूखंड के कब्जे की तारीख से 36 महीने के भीतर दिया जाना था जिसके लिए शिकायतकर्ता (complainant) को विक्रय मूल्य का 90% जमा करना था | हालांकि, शिकायतकर्ता (complainant) ने केवल शुद्ध बिक्री मूल्य का 20% भुगतान किया था | भुगतान को बनाने में शिकायतकर्ता (complainant) की ओर से नियमित विलंब किया गया | अन्य सभी आरोपों को नकारते हुए और कहा कि उनकी ओर से सेवा में कोई कमी नहीं है, उन्होंने शिकायत की बर्खास्तगी के लिए प्रार्थना की |
फोरम (Forum) ने दोनों पक्षों को सुना और मौजूद सभी दस्तावेजों को और सबूतों को देखा और पाया की बिल्डर को सम्बंधित अथॉरिटी डिपार्टमेंट की तरफ से कोई भी अनुमति नहीं मिली थी, जो 2014 में किसी भी प्रोजेक्ट को स्थापना के लिए जरूरी था, जब शिकायतकर्ता (complainant) ने 5.03 लाख रुपये दिए थे |
"बिल्डर के लिखित बयान कहे गए दावे फ़ैल पूरी तरह से फ़ैल हो गए क्योकि वह कोई भी ऐसा सबूत फोरम के समक्ष नहीं रख पाए जिससे फोरम ये मानती की उन्होंने सम्बंधित अथॉरिटी डिपार्टमेंट से प्रोजेक्ट के लिए अनुमति मिली हुई थी |"
इसलिए, फोरम ने अपने निष्कर्ष में कहा कि PARA ACT, 1995 के अनुसार इसमें बिल्डर की ही गलती है और इसलिए, इस स्कोर पर शिकायतकर्ता (complainant) को उचित सेवा प्रदान करने में कमी थी |
जिसके बाद फोरम ने निर्देश दिया की उपभोक्ता को 25,000 रुपये मुआवजे के रूप में और 10,000 रुपये कानूनी खर्च के लिए दिए जाये |
Content Source: TOI
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